गोलू देवता की अद्भुत कहानी: न्याय के देवता की पूरी कथा, चितई मंदिर का रहस्य और सच्चाई की जीत


उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र की पहाड़ियाँ केवल प्राकृतिक सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि अद्भुत लोक देवताओं की वीर गाथाओं से भी सजी हुई हैं। इनमें से एक प्रमुख नाम हैं – गोलू देवता। जिन्हें 'न्याय के देवता', 'गोरिल देव', 'ग्वाल महाराज' और 'गौर भैरव' जैसे कई नामों से पुकारा जाता है। कुमाऊँ की जन-जन की आस्था के केंद्र गोलू देवता की कहानी केवल एक कथा नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और मातृ-प्रेम की अद्वितीय विजय गाथा है।

यह लेख गोलू देवता के जन्म से लेकर उनके न्यायप्रिय शासन और उनके प्रसिद्ध चितई मंदिर तक की संपूर्ण यात्रा को विस्तार से प्रस्तुत करता है।






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 न्याय की देवत्व की यात्रा


गोलू देवता केवल एक लोक देवता नहीं हैं, वे करोड़ों भक्तों के विश्वास की वह शक्ति हैं, जहाँ लोग अपनी व्यथा-कथा लेकर जाते हैं और न्याय पाकर लौटते हैं। पहाड़ में आज भी यह मान्यता है कि गोलू देवता का नाम लेते ही असत्य पर सत्य की विजय होती है। उनके मंदिरों में घंटियों की संख्या नहीं, बल्कि लोगों की मुरादें पूरी होने के प्रमाण स्वरूप लाखों घंटियाँ टँगी हैं।

यह कहानी है राजा झालुराई की, जिनकी तपस्या से स्वयं भगवान भैरव ने पुत्र रूप में जन्म लिया। पर यह जन्म सरल नहीं था, इसमें थी षड्यंत्रों की अग्नि परीक्षा, था मातृ-वियोग का दंश और अंत में न्याय की स्थापना का अद्भुत प्रकाश।


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नि:संतान राजा की तपस्या


कत्यूरी राजवंश के प्रतापी राजा झालुराई का शासन था। वे न्यायप्रिय, दयालु और पराक्रमी राजा थे। प्रजा उनसे सुखी थी, उनका राज्य समृद्ध था, पर उनके मन में एक गहरी पीड़ा थी – संतान का अभाव।

राजा की सात रानियाँ थीं, लेकिन एक भी पुत्र नहीं था जो राज्य का भार संभाल सके। वंश के आगे न बढ़ने का भय राजा को दिन-रात परेशान करता था। राज्य की सारी व्यवस्थाएँ उन्हें अधूरी लगतीं।

एक दिन राजा ने राज्य के प्रसिद्ध ज्योतिषी को बुलाया। ज्योतिषी ने राजा को परामर्श दिया कि वे भगवान भैरव की कठोर तपस्या करें। राजा झालुराई ने यह सुनकर तुरंत निर्णय लिया। वे घने जंगलों में चले गए और भगवान भैरव की आराधना में लीन हो गए।

दिन, महीने और साल बीतते गए। राजा ने कठोर व्रत-नियम धारण किए। अंततः भगवान भैरव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और प्रकट हुए। उन्होंने पूछा, "हे राजन, तुमने इतनी कठोर तपस्या क्यों की?"

राजा झालुराई ने नतमस्तक होकर कहा, "प्रभु, मेरे पास सब कुछ है – राज्य, वैभव, सात रानियाँ। परंतु एक पुत्र नहीं है जो मेरे वंश को आगे बढ़ाए। मैं संतान सुख से वंचित हूँ।"

भगवान भैरव ने मुस्कुराते हुए कहा, "राजा, तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। मैं स्वयं तुम्हारे घर पुत्र रूप में जन्म लूंगा। किंतु इसके लिए तुम्हें एक शर्त माननी होगी – तुम्हें आठवां विवाह करना होगा। "

राजा प्रसन्नता से भर गए। उन्होंने पूछा, "प्रभु, वह कौन सौभाग्यशाली स्त्री होगी जिसके गर्भ से आप जन्म लेंगे?"

भगवान भैरव ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "समय आने पर तुम्हें स्वयं पता चल जाएगा।" इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।


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 तालाब के किनारे मिली आठवीं रानी


वरदान मिलने के बाद भी राजा को आठवीं रानी नहीं मिल रही थी। वे इसी खोज में दिन बिताते। एक दिन राजा शिकार के लिए घने जंगल में गए। शिकार करते-करते वे अपने दल से दूर निकल गए। सूरज ढलने लगा और उन्हें अत्यधिक प्यास लगी।

उनके सेवक पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहे थे, पर काफी समय बीत जाने पर भी वे वापस नहीं लौटे। चिंतित होकर राजा स्वयं उनकी खोज में निकले। कुछ दूरी पर उन्हें एक सुंदर तालाब दिखा। पास पहुँचकर उन्होंने देखा कि उनके सभी सेवक वहीं मूर्छित पड़े थे।

राजा घबराकर पानी पीने के लिए आगे बढ़े, तभी एक दिव्य स्त्री की आवाज़ गूंजी, "रुको! यह तालाब मेरा है। मेरी अनुमति के बिना यहाँ से पानी लेने का साहस मत करो, वरना तुम्हारा भी यही हाल होगा।"

राजा ने पीछे मुड़कर देखा तो वह स्त्री अद्भुत रूप-लावण्य से संपन्न थी। उसके व्यक्तित्व में एक अलौकिक तेज था। राजा ने अपना परिचय देते हुए कहा, "मैं इस राज्य का राजा झालुराई हूँ। आप कौन हैं, देवी?"

स्त्री ने कहा, "मैं देवी कलिंगा हूँ, पंच देवताओं की बहन। यदि तुम सच में राजा हो, तो अपनी पहचान साबित करो।"

राजा ने पूछा, "आप कैसे प्रमाण चाहती हैं?"

उस समय वहाँ दो भैंसे आपस में भयंकर लड़ रहे थे। देवी कलिंगा ने उनकी ओर इशारा करते हुए कहा, "यदि तुम इन दोनों को अलग कर सको, तो मैं मानूंगी कि तुम राजा हो।"

राजा ने भरसक प्रयास किया, परंतु वे भैंसों को अलग नहीं कर पाए। तब देवी कलिंगा स्वयं आगे बढ़ीं और एक हाथ के इशारे पर दोनों भैंसे शांत हो गए।

राजा यह देखकर अत्यधिक प्रभावित हुए। उनके हृदय में देवी कलिंगा के प्रति आदर और प्रेम उमड़ आया। उन्होंने पंच देवताओं के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। देवता राजा की महानता से प्रभावित थे, अतः दोनों का विवाह संपन्न करा दिया गया।


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 सात रानियों की ईर्ष्या और षड्यंत्र


रानी कलिंगा के महल में आने के बाद कुछ ही समय में वे गर्भवती हुईं। यह देखकर राजा की सातों रानियों के मन में ईर्ष्या की आग भड़क उठी। उन्हें भय था कि कहीं इस नई रानी का पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी न बन जाए।

सातों रानियों ने मिलकर एक क्रूर षड्यंत्र रचा। उन्होंने रानी कलिंगा से कहा, "एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की है कि तुम्हारा पुत्र केवल तभी जीवित रहेगा जब तुम प्रसव के समय उसे नहीं देखोगी। यदि तुमने उसे देख लिया, तो वह मर जाएगा।"

मासूम रानी कलिंगा ने सातों रानियों की बात मान ली। प्रसव का दिन आया। रानी कलिंगा की आँखों पर पट्टी बाँध दी गई। उन्होंने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया, लेकिन उसकी पहली आवाज़ सुनते ही सातों रानियों ने नवजात शिशु को वहाँ से उठाकर गोशाला में फेंक दिया।

रानी कलिंगा से उन्होंने कहा, "तुमने एक सिलवट्टे (पत्थर) को जन्म दिया है।" और खून से लथपथ एक पत्थर उनकी गोद में दे दिया।


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  अद्भुत शिशु की सुरक्षा


गोशाला में पड़े उस नन्हें शिशु को देखकर वहाँ की गायें मातृवत उसके पास आ गईं। एक गाय ने उसे अपना दूध पिलाया। शिशु सुरक्षित था।

जब सातों रानियों को पता चला कि बच्चा अभी भी जीवित है, तो उन्होंने उसे नमक के ढेर में दबा दिया। पर चमत्कार देखिए, नमक का ढेर चीनी का ढेर बन गया और बच्चा हँसते हुए बाहर आ गया।

अगली बार उन्होंने बच्चे को बिच्छुओं के बीच फेंक दिया, पर बिच्छुओं ने भी उसे कुछ नहीं किया। अब सातों रानियाँ निराश हो गईं। उन्होंने बच्चे को एक संदूक में बंद करके काली नदी में बहा दिया।

सात दिन और सात रात बीत गए। संदूक नदी की लहरों में बहता रहा। अंत में एक गरीब मछुआरे का जाल उस संदूक में फँसा। मछुआरे ने जब संदूक खोला तो उसके अंदर एक दिव्य तेज से युक्त बालक था।

मछुआरे और उसकी पत्नी निःसंतान थे। उन्होंने इसे ईश्वर का दिया हुआ वरदान मानकर बालक को अपने घर ले गए और पुत्रवत पालन-पोषण करने लगे।


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सत्य का उदय – बालक को मिला ज्ञान


समय बीतता गया और बालक बड़ा होने लगा। उसमें अपरंपार शक्तियाँ थीं, वह बाल-सुलभ हरकतों से ही चमत्कार कर देता था। एक दिन वह सो रहा था तो उसे एक दिव्य स्वप्न आया।

स्वप्न में उसे पता चला कि वह राजा झालुराई का पुत्र है, और उसकी सात सौतेली माताओं ने उसे धोखे से उसके माता-पिता से अलग कर दिया था। उसे अपना पूरा जीवन उद्देश्य और जन्म की सारी घटनाएँ याद आ गईं।

जागने के बाद वह मछुआरे के पास गया और बोला, "पिताश्री, मुझे एक घोड़ा चाहिए। मैं अपने वास्तविक पिता से मिलने जाऊँगा।"

मछुआरा गरीब था, उसके पास असली घोड़ा खरीदने के पैसे नहीं थे। उसने लकड़ी का एक घोड़ा बनाकर बालक को दे दिया।

बालक ने मुस्कुराते हुए अपने दिव्य सामर्थ्य से उस लकड़ी के घोड़े को स्पर्श किया – और घोड़ा जीवित हो गया। वह उस पर सवार होकर राजा झालुराई की राजधानी की ओर चल पड़ा।


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राजदरबार में सत्य का प्रकाश


राजधानी के बाहर एक तालाब के किनारे सातों रानियाँ विहार कर रही थीं। बालक ने अपने घोड़े को फिर से लकड़ी का बना दिया और उनके पास जाकर बोला, "हटो, मेरे घोड़े को पानी पीना है।"

रानियाँ हँसने लगीं। एक रानी बोली, "बालक, तुम पागल हो क्या? लकड़ी का घोड़ा कैसे पानी पी सकता है?"

बालक ने तुरंत उत्तर दिया, "अगर इस राज्य की रानियाँ एक सिलवट्टे को जन्म दे सकती हैं, तो क्या मेरा लकड़ी का घोड़ा पानी नहीं पी सकता?"

यह सुनकर रानियों के चेहरे उड़ गए। उन्होंने बालक को पकड़कर राजा के सामने पेश किया।

राजा झालुराई ने बालक से पूछा, "बेटा, क्या तुम नहीं जानते कि लकड़ी का घोड़ा पानी नहीं पी सकता?"

बालक ने उसी वाक्य को दोहराया, "राजन, जब इस राज्य की महारानी एक पत्थर को जन्म दे सकती है, तो क्या मेरा घोड़ा पानी नहीं पी सकता?"

फिर बालक ने राजा को सब कुछ बता दिया – भगवान भैरव का वरदान, आठवें विवाह की शर्त, रानी कलिंगा से विवाह, अपने जन्म की पूरी घटना, और सातों रानियों द्वारा उसे मारने के प्रयास।

राजा झालुराई उस रहस्य को जानते थे जो केवल उन्हें और भगवान भैरव को मालूम था। उन्हें विश्वास हो गया कि यह बालक उनका ही पुत्र है।

राजा का क्रोध सातों रानियों पर टूटा। उन्होंने उन्हें तुरंत कारावास में डलवा दिया। रानियाँ विलाप करने लगीं और रानी कलिंगा से क्षमा माँगने लगीं।

बालक ने राजा से कहा, "पिताश्री, इन्हें क्षमा कर दीजिए। इनके किए का फल इन्हें मिल चुका है।" राजा ने बालक के कहने पर सातों रानियों को मुक्त कर दिया।


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  गोलू देवता – न्याय के देवता


राजा झालुराई के बाद इस बालक ने राज्य की बागडोर संभाली। वे गोलू देवता के नाम से विख्यात हुए। उनका शासन न्याय का प्रतीक बन गया।

गोलू देवता के दरबार में हर किसी को न्याय मिलता था। चाहे वह राजा हो या रंक, उनके लिए सभी समान थे। लोग दूर-दूर से अपनी समस्याएँ लेकर आते और न्याय पाकर जाते।

धीरे-धीरे यह विश्वास दृढ़ होता गया कि गोलू देवता केवल एक शासक नहीं, बल्कि न्याय के देवता हैं। उनकी पूजा आराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं, झूठे आरोपों से मुक्ति मिलती है, और सच्चाई की जीत होती है।

गोलू देवता को ग्वाल महाराज, गोलजू, बाला गोरिया, गोरिल देव और गौर भैरव के नाम से भी पूजा जाता है।


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 चितई मंदिर – आस्था का केंद्र


कुमाऊँ क्षेत्र में गोलू देवता के अनेक मंदिर हैं, लेकिन सबसे प्रसिद्ध मंदिर अल्मोड़ा जिले के चितई नामक स्थान पर स्थित है। यह मंदिर अल्मोड़ा शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है।

इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ भक्त अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं और पूर्ण होने पर घंटियाँ चढ़ाते हैं। मंदिर परिसर में हजारों की संख्या में घंटियाँ टँगी हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि कैसे गोलू देवता ने अपने भक्तों की हर पुकार सुनी।

मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से कोई भी मुराद माँगने पर वह अवश्य पूर्ण होती है। साथ ही, यदि कोई अन्याय का शिकार होकर यहाँ आता है, तो गोलू देवता के दरबार में उसे शीघ्र ही न्याय मिलता है।

पौराणिक मान्यता: एक अन्य लोक कथा के अनुसार, चंद राजवंश के राजा बाज बहादुर के सेनापति गोलू देव नामक वीर योद्धा थे, जिन्होंने युद्ध में वीरगति प्राप्त की थी। उनके सम्मान में ही इस मंदिर की स्थापना हुई। यही कारण है कि गोलू देवता को वीरता और न्याय का प्रतीक माना जाता है।

चम्पावत जिले में भी गोलू देवता को कुल देवता के रूप में पूजा जाता है, और वहाँ नौ दिनों तक विशेष अनुष्ठान होते हैं।


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 आज भी जीवित हैं गोलू देवता


गोलू देवता की कहानी केवल एक पौराणिक कथा मात्र नहीं है। यह पहाड़ की जन-जन में बसी हुई जीवंत आस्था है। आज भी उत्तराखंड के कोने-कोने में गोलू देवता के मंदिर हैं, और हर साल हजारों श्रद्धालु चितई पहुँचकर अपनी मुरादें माँगते हैं।

न्याय के इस देवता का चमत्कार यह है कि उनकी कहानी सदियों बाद भी लोगों को असत्य के खिलाफ आवाज़ उठाने की प्रेरणा देती है। वे सिखाते हैं कि सत्य कभी पराजित नहीं होता, और मातृ-प्रेम की शक्ति के आगे हर षड्यंत्र असफल हो जाता है।

गोलू देवता केवल एक देवता नहीं, वे न्याय की वह मशाल हैं जो अन्याय के अंधकार में मार्ग दिखाती है।


जय गोलू देवता!

न्याय की जय!


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यह लेख मूल रूप से लोक कथाओं और ऐतिहासिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक जानकारी प्रदान करना है।





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